Monday, June 06, 2016

Best of Piyush Mishra

|| अभी अभी कुछ गुज़रा है, लापरवाह, धूल में दौड़ता हुआ,
ज़रा पलट कर देखुं तो, बचपन था शायद ||

वक़्त बहुत कुछ छीन लेता है, 
खैर मेरी तो सिर्फ़ मुस्कुराहट थी 

आज तक उस थकान से दुःख रहा है बदन...
एक सफ़र किया था मैंने ख्वाहिशो के साथ

हम नफरत के काबिल थे तो नफरत से ही मार देते...!!
क्यों अपनी महफ़िल में बुलाकर प्यार से कह दिया.. कौन हो तुम..

जिन्दगी की हर सुबह कुछ शर्ते लेके आती है
और जिन्दगी की हर शाम तजुर्ब दे जाती है।.....

सौदा कुछ ऐसा किया है तेरे ख़्वाबों ने मेरी नींदों से….
या तो दोनों आते हैं …. या कोई नहीं आता !!!

इन हसरतों को इतना भी कैद में ना रख ए-जिंदगी,..
ये दिल भी थक चुका है, इनकी जमानत कराते कराते...!!

कांटो से बच बच के चलता रहा उम्र भर..
क्या खबर थी की.. चोट एक फूल से लग जायेगी 

इक 'तुम्हारे सिवा था ही 'कौन मेरा.. 
फिर तनहा 'किस के 'सहारे छोड़ गये तुम

|| बहुत अंदर तक तबाही मचा देता है ..
वो अश्क जो आँख से बह नहीं पाता ||

ll हर लम्हा बढ़ती जाती है दोगुनी रफ़्तार से

क्यूं न तेरी यादों का कारोबार किया जाए ll

|| ए उम्र कुछ कहा मैंने, शायद तूने सुना नहीं..
तू छीन सकती है "बचपन" मेरा .. पर "बचपना" नहीं ||

|| जिम्मेदारियां ओढ़ के निकलता हूँ घर से यारो,
वर्ना बारिशों में भीगने का शौक तो अब भी है ||

|| हुए बदनाम मगर फिर भी न सुधर पाए हम,
फिर वही शायरी, फिर वही इश्क, फिर वही तुम ||

चलो अब जाने भी दो....क्या करोगे दास्तां सुनकर,,, ख़ामोशी तुम समझोगे नही....और बयां हमसे होगा नही !!

हसरत हर बार, तुझे मिलने के बाद, एक ही कचोटती रही.....
क्यूँ न लौटते वक्त, और एक बार, तूझे देख लिया होता..

सोचता हूँ धोखे से ज़हर दे दूँ...
सभी ख्वाहिशों को दावत पे बुला कर!

जमीं गांव की बेचकर वो शहर में आ तो गया..
सिक्के खनकते हैं जेबों में..सुकूं का बाजार नहीं मिलता..!

पहले तो यूं ही गुज़र जाती थीं..... मोहोब्बत हुई तो रातों का एहसास हुआ...

|| जो ज़िन्दगी थी मेरी जान, तेरे साथ गयी..
बस अब तो उम्र के नक़्शे में वक़्त भरना है ||

|| दर्द की बारिशों में
हम अकेले ही थे..
जब बरसी ख़ुशियाँ
न जाने भीड़ कहां से आ गयी ||

मैं तुझसे अब कुछ नहीं माँगता ऐ ख़ुदा,.. 
तेरी देकर छीन लेने की आदत मुझे मंज़ूर नहीं..!

|| आज मैंने फिर जज्बात भेजे,
तुमने फिर अलफ़ाज़ ही समझे ||

|| इक इतवार ही है, जो रिश्तों को संभालता है..
बाकी दिन किश्तों को संभालने में खर्च हो जाते हैं ||

ज़िन्दगी सारी गुज़र जाएगी काँटो की कगार पर,
फिर एक दिन फूल मचाएंगे भीड़ हमारी मज़ार पर

|| गैरों से पूछती है तरीक़ा निजात का,
अपनों की साज़िशों से परेशान ज़िन्दगी ||

|| मज़हब पता चला, जो मुसाफ़िर की लाश का..
चुपचाप आधी भीड़ घरों को चली गई ||

तुझको हुई ना खबर,
न ज़माना समझ सका
हम चुपके चुपके तुझ पे
यूँ कई बार मर गये ll

ll वो ना ही मिलते तो अच्छा था..
बेकार में मोहब्बत से नफ़रत हो गई..।।

l l काश में पलट जाऊ बचपन की वादी में..
जहाँ न कोई ज़रूरत थी न कोई ज़रूरी था.. l l

|| हल्की-फुल्की सी है जिंदगी..
बोझ तो .. ख्वाहिशों का है ||

|| मिट्टी भी जमा की, और खिलौने भी बना कर देखे..
ज़िन्दगी कभी न मुस्कुराई फिर, बचपन की तरह ||

ख़ुदा के नाम पे जिस तरह लोग मर रहे हैं
दुआ करो कि अकेला ख़ुदा न रह जाए

एक उमर की मेहनत से जो मकान बना .. 
वो मेरे बच्चों को सस्ता दिखाई देता है

|| छत टपकती है उसके कच्चे घर की,
वो किसान फिर भी बारिश की दुआ माँगता है ||

कुछ रिश्तों की उमर कम जरूर होती है
पर उन्हें निभाने वाले उसी में ज़िन्दगी ढ़ूँढ लेते है ll

ll वजह ना डूँढ साथी
इश्क़ में सब बेवजह ही होता हैं ll

ll कागज़ के नोटों से आखिर
किस किस को खरीदोगे,
किस्मत परखने के लिए यहाँ आज भी
सिक्का ही उछाला जाता है! ll


मंज़िल दूर नहीं थीं साथी
बस हमारी ही दीवानगी में कमी थीं थोड़ी ll

न हिन्दू को सुकूं.. न मुसलमां को चैन..
सियासत मजे में थी..सियासत मजे में है

5 आरोपी छात्र ‪#‎JNU‬ कैंपस से फरार!!
वो अपने घर से खुद नहीं निकल रहे ग़ालिब... जो हर घर से ‪#‎अफज़ल‬ निकाल रहे थे...

कैसे करें हम खुद को,
तेरे प्यार के क़ाबिल..
जब हम आदतें बदलते हैं,
तो तुम शर्तें बदल देते हो..!!

ll यूँ तो अन्दाज़-ए-बया बदल देता है 
हर बात का मतलब
वरना जहान में कोई बात नही 
कोई बात नही कोई बात नही ll

दस्तक में कोई दर्द की ख़ुश्बू ज़रूर थी
दरवाज़ा खोलने के लिए घर का घर उठा

घर से निकल कर जाता हूँ मैं रोज़ कहाँ
इक दिन अपना पीछा कर के देखा जाए

ll दायरा हर बार बनाता हूँ ज़िन्दगी के लिए,
लकीरें वहीँ रहती हैं, मैं ख़िसकता जाता हूँ ll

अब कहां दुआओं में वो बरकतें,,...
वो नसीहतें ...वो हिदायतें,
अब तो बस जरूरतों का जुलुस हैं ...
मतलबों के सलाम हैं...!!!

|| इलाईची के दानों सा मुक़द्दर है अपना,
महक उतनी ही बिखरी .. पीसे गए जितना ||

अंत में सब ठीक हो जाएगा ll
या तो तुम जीत जाओगे या सीख जाओगे ll

कुछ साल पहले ... डायरी में लिखते लिखते छोड़ आया था तुम्हें .....
 आज भी पन्ने पलटता हूँ ... तो नज़र आ जाती हो ..

|| यहाँ रोटी नहीं उम्मीद सबको जिन्दा रखती है,
जो सड़कों पर भी सोते हैं .. सिरहाने ख़्वाब रखते हैं ||

|| औक़ात नही थी जमाने में जो मेरी कीमत लगा सके,
कबख़्त इश्क में क्या गिरे, मुफ़्त में नीलाम हो गए |

ll दुनिया भर की यादें हमसे मिलने आती हैं , 
शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है .ll

ll यहाँ बिकता है सब.. रहना ज़रा संभल के.. 
हवा को भी बेच देते हैं.. गुब्बारों में भर के.." ll

|| मोहब्बत बुरी है..बुरी है मोहब्बत -मोहब्बत ....कहे जा रहे हैं .. किये जा रहे हैं |l

बस इतना सा मलसफ़ा हैं ज़िंदगी का ll
ख़ुश भी वहीं कर सकता है जो ख़ुश है ll

|| रास्ते कहा खत्म होते हैं, ज़िन्दगी के इस सफ़र में ..
मंजिल तो वही है, जहाँ ख्वाहिशें थम जाये ||