ame>
Thursday, December 25, 2014
Sunday, December 21, 2014
जीवन की आपाधापी में ...
जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पैर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला
जिस दिन मेरी चेतना जागी मैने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पैर एक भुलावे में भूला,
हर एक लगा है अपनी अपनी दें लें में,
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भॉँच्चका सा --
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊं किस जगह?
फिर एक तरफ़ से आया ही तो धक्का सा,
मैने भी बहना शुरू किया इस रेले में;
क्या बाहर की तेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का उहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा वही मन के अंदर से उबल चला
जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला
मेला जितना भड़कीला रंग रंगीला था
मानस के अंदर उतनी ही कमज़ोरी थी
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी
उतनी ही छोटी अपने कर की झोली थी
जितना ही बिर्मे रहने की थी अभिलाषा
उतना ही रेले तेज़ धकेले जाते थे
क्रय-वि क्रय तो ठंडे दिल से हो सकता है
ये तो भागा भागी की छीना जोरी थी
अब मुझ से पूछा जाता है क्या बतलाऊं
क्या मैं अकिंचन बिखराता पाठ पर आया
वह कौन रतन अनमोल ऐसा मिला मुझको
जिस पर अपना मान प्राण निछावर कर आया
ये थी तक़दीरी बात, मुझे गुण-दोष ना दो
जिसको समझा था सोना वो मिट्टी निकली
जिसको समझा था आँसू वो मोती निकला
जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला
मैं जितना ही भूलुँ भटकूँ या भरमाऊं
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है
कितने ही मेरे पाँव पड़ें उँचे नीचे
प्रति पल वो मेरे पास चली ही आती है
मुझ पर विधि का अहसान बहुत सी बातों का
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सब से ज़्यादा --
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती
कुछ देर कहीं पैर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला
जिस दिन मेरी चेतना जागी मैने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पैर एक भुलावे में भूला,
हर एक लगा है अपनी अपनी दें लें में,
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भॉँच्चका सा --
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊं किस जगह?
फिर एक तरफ़ से आया ही तो धक्का सा,
मैने भी बहना शुरू किया इस रेले में;
क्या बाहर की तेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का उहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा वही मन के अंदर से उबल चला
जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला
मेला जितना भड़कीला रंग रंगीला था
मानस के अंदर उतनी ही कमज़ोरी थी
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी
उतनी ही छोटी अपने कर की झोली थी
जितना ही बिर्मे रहने की थी अभिलाषा
उतना ही रेले तेज़ धकेले जाते थे
क्रय-वि क्रय तो ठंडे दिल से हो सकता है
ये तो भागा भागी की छीना जोरी थी
अब मुझ से पूछा जाता है क्या बतलाऊं
क्या मैं अकिंचन बिखराता पाठ पर आया
वह कौन रतन अनमोल ऐसा मिला मुझको
जिस पर अपना मान प्राण निछावर कर आया
ये थी तक़दीरी बात, मुझे गुण-दोष ना दो
जिसको समझा था सोना वो मिट्टी निकली
जिसको समझा था आँसू वो मोती निकला
जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला
मैं जितना ही भूलुँ भटकूँ या भरमाऊं
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है
कितने ही मेरे पाँव पड़ें उँचे नीचे
प्रति पल वो मेरे पास चली ही आती है
मुझ पर विधि का अहसान बहुत सी बातों का
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सब से ज़्यादा --
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती
मैं जहां खडा था कल उस थल पर आज नहीं
कल इसी जगह फ़िर पाना मुझको मुश्किल है
ले मापदण्ड जिसको परिवर्तित कर्देतीं केवल छूकर ही
देश काल की सीमायें जग दे मुझपर फ़ैसला उसे जैसा भाये
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में
जीवन के इस एक और
पेहलू से होकर निकल चला
जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पैर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला
कल इसी जगह फ़िर पाना मुझको मुश्किल है
ले मापदण्ड जिसको परिवर्तित कर्देतीं केवल छूकर ही
देश काल की सीमायें जग दे मुझपर फ़ैसला उसे जैसा भाये
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में
जीवन के इस एक और
पेहलू से होकर निकल चला
जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पैर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला
Sunday, February 02, 2014
The future of India is incredibly bright!
Look around and you will find an eager, skilled and motivated sea of human capital in our country. As we think of 2014 elections and the predictions thereof, it might not matter too much which party comes to power. India is witnessing an amazing transition...
- 50% of our population is under 30!
- Steady improvement in enrollment rates for primary and higher education (CAGR of over 10% for enrollment in higher education in the past decade)
- The young are oozing confidence! The successes of corporate India have helped create a mindset which is unencumbered from any form of inferiority complex
- Technology is enabling the population to access the world in a much easier manner and in an unprecedented way. Mobiles have become smart & data enabled. That has opened up the world for our people
- The young are expressing themselves in all spheres of life - sports (slowly but surely its not only about cricket.. there are more icons now), politics (see the rise of AAP, an alternate way of politics), music, acting (see the kind of rookies who are taking on Bollywood, despite their not being from a 'family' or 'dynasty')
India to me seems unstoppable today. As long as its democratic, secular fabric is maintained we are destined for a great future. Does not matter whether it is the Congress, BJP, NDA, UPA, AAP or the 3rd Front who is in power. It simply doesn't matter!
Subscribe to:
Posts (Atom)