Sunday, December 21, 2014

जीवन की आपाधापी में ...

जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला 
कुछ देर कहीं पैर बैठ कभी ये सोच सकूँ 
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला 

जिस दिन मेरी चेतना जागी मैने देखा 
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में, 
हर एक यहाँ पैर एक भुलावे में भूला, 
हर एक लगा है अपनी अपनी दें लें में, 

कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भॉँच्चका सा -- 
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊं किस जगह? 
फिर एक तरफ़ से आया ही तो धक्का सा, 
मैने भी बहना शुरू किया इस रेले में; 

क्या बाहर की तेला-पेली ही कुछ कम थी, 
जो भीतर भी भावों का उहापोह मचा, 
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी, 
जो कहा वही मन के अंदर से उबल चला 

जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला 
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ 
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला 

मेला जितना भड़कीला रंग रंगीला था 
मानस के अंदर उतनी ही कमज़ोरी थी 
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी 
उतनी ही छोटी अपने कर की झोली थी 

जितना ही बिर्मे रहने की थी अभिलाषा 
उतना ही रेले तेज़ धकेले जाते थे 
क्रय-वि क्रय तो ठंडे दिल से हो सकता है 
ये तो भागा भागी की छीना जोरी थी 

अब मुझ से पूछा जाता है क्या बतलाऊं 
क्या मैं 
अकिंचन बिखराता पाठ पर आया 
वह कौन रतन अनमोल ऐसा मिला मुझको 
जिस पर अपना मान प्राण 
निछावर कर आया 

ये थी तक़दीरी बात, मुझे गुण-दोष ना दो 
जिसको समझा था सोना वो मिट्टी निकली 
जिसको समझा था आँसू वो मोती निकला 

जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला 
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूँ 
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला 

मैं जितना ही भूलुँ 
भटकूँ या भरमाऊं 
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है 
कितने ही मेरे पाँव पड़ें उँचे नीचे 
प्रति पल वो मेरे पास चली ही आती है 

मुझ पर विधि का अहसान बहुत सी बातों का 
पर मैं 
कृतज्ञ  उसका इस पर सब से ज़्यादा -- 
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले, 
अनवरत समय की चक्की चलती जाती
मैं जहां खडा था कल उस थल पर आज नहीं
कल इसी जगह फ़िर पाना मुझको मुश्किल है
ले मापदण्ड जिसको परिवर्तित कर्देतीं केवल छूकर ही
देश काल की सीमायें जग दे मुझपर फ़ैसला उसे जैसा भाये

लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में 
जीवन के इस एक और 
पेहलू से होकर निकल चला

जीवन की आपा धापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पैर बैठ कभी ये सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना, उसमें क्या बुरा भला

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