इक मुलाकात, कई खत
गिले शिकवे, कुछ ख़ुशी
के पल
एक शुरुआत जिसका कोई
अंत नहीं
एक रात जिसकी कोई सुबह
नहीं
कई साल बीते
मिले नए लोग, आते जाते
पर रह रह कर एक ख़याल
आए
क्या उस आहट को भुला
पाये?
एक दुआ की हम रूबरू नहीं
हों कभी
एक डर की डगमगा न जाये
अभी
खुद पर शुबा की फिर भटक
न जाएं
उस भूलभुलैया से फिर
कौन निकल पाये?
और फिर इतनी शिद्दत के
बाद
इतनी हाथ जोड़े मांगी
दुआएं हुई ख़ाक
एक बार फिर, क्यों हुआ
ऐसे
की एक आहट, और रूबरू
हो गए फिर से
एक आहट ही काफी है रुलाने
के लिए
बरसों के ज़ख्म हरे कर
जाने के लिए
आँखें नम औ दिल कमज़ोर
फिर
क्यूँ जी भर आया आखिर!
काश की दिल भटका ही न
होता
काश की बजाये दिल के
एक पत्थर होता
बहुत अफ़सोस शुदा मन है
बस एक आहट की काफी है...
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